लैलूंगा

छेर छेरा राज्य की संस्कृतिक धरोहर एवं क़ृषि पर आधारित पर्व पत्रकार रोहित कुमार चौहान

छेर छेरा राज्य की संस्कृतिक धरोहर एवं क़ृषि पर आधारित पर्व पत्रकार रोहित कुमार चौहान

छत्तीसगढ़ राज्य की सांस्कृतिक धरोहर और परंपराओं में गहरी जड़ें जमाए हुए कई पर्व और उत्सव हैं, जो न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण होते हैं, बल्कि समाज में सामूहिकता, भाईचारे और सामाजिक सहयोग की भावना को भी बढ़ावा देते हैं। इनमें से एक प्रमुख और विशिष्ट पर्व छेरछेरा है, जो विशेष रूप से छत्तीसगढ़ के रायगढ़ क्षेत्र में धूमधाम से मनाया जाता है। यह पर्व छत्तीसगढ़ की ग्रामीण संस्कृति का आदर्श प्रस्तुत करता है और किसानों के जीवन से जुड़ा हुआ है। छेरछेरा पर्व कृषि पर आधारित होने के कारण यह नए कृषि मौसम और फसल कटाई के बाद मनाया जाता है, जिसे हर साल पौष पूर्णिमा के दिन बड़े धूमधाम से मनाया जाता है।
समाज में सामूहिकता और सहयोग का प्रतीक है छेरछेरा
छेरछेरा पर्व की शुरुआत में ग्राम देवताओं की पूजा होती है, जिसे ग्रामीण अपने क्षेत्र की सुरक्षा के लिए तथा कृषि की उन्नति की कामना से करते हैं। यह पर्व फसल के कटाई के बाद एक सामूहिक उत्सव के रूप में मनाया जाता है, जो समाज के सभी वर्गों को एकजुट करता है। इस दिन विशेष रूप से छोटे बच्चे, युवक और युवतियां हाथ में टोकरी या बोरियां लेकर घर-घर छेरछेरा मांगने निकलते हैं। वे ष्छेर छेरता माई मोरगी मार दे, कोठे के धान ला हेर देष् जैसे पारंपरिक गीत गाते हुए घरों के सामने जाते हैं और वहां से नया चावल और नकद राशि प्राप्त करते हैं। यह सब एक सामूहिक खुशी का हिस्सा होता है, जो पूरे गांव को उत्साहित और सामूहिक रूप से एकजुट करता है।
जनजातीय समुदाय की धार्मिक मान्यताएं और परंपराएं
समाज की एकता और सामूहिक सहयोग को दर्शाते हुए यह पर्व केवल एक पारंपरिक उत्सव ही नहीं है, बल्कि यह सामाजिक और आर्थिक सहयोग का एक महत्वपूर्ण माध्यम भी बन जाता है।